मीटिंग पर मीटिंग का दौर है चालू, क्या वायरस की तरह फैल रहा मीटिंग का बुखार?


  • क्या आप अधिकतर समय ऑफिस में मीटिंग में बिजी रहते हैं?
  • क्या बार बार मीटिंग के बावजूद आपका परिणाम सुखद नहीं है?
  • क्या बॉस ज्यादातर समय आपसे काम की शिकायत के लिए मीटिंग करता है?
  • क्या मीटिंग आपकी निष्कर्ष रहित होती है?
  • क्या मीटिंग में अकसर एक ही मुद्दे पर अलग अलग तरह से बात की जाती है?
वास्तव में मीटिंग समस्या बन गया है, अधिकतर कामकाजी लोग इस समस्या को झेल रहे हैं। खासकर युवाओं के लिए मीटिंग का फैशन नुकसानदेह साबित हो रहा है। मीटिंग कामकाज में बेहतरी लाने का अच्छा माध्यम बनने की बजाय युवाओं के लिए घाटे का सौदा बनती जा रही है। मीटिंग में बैठकर मीटिंग का शौक रखने वालों की रटी-रटायी बातें सुनने को मजबूर हैं। वहीं काम के बजाय तफरीह में ज्यादा दिलचस्पी रखने वाले युवाओं को ये मीटिंग्स खूब भा रही हैं।

अब आफिसों में काम के बजाय मीटिंग ज्यादा होती है।
दरअसल, मीटिंग का मकसद किसी खास विषय पर विचारविमर्श होता है। लेकिन वर्तमान समय में मीटिंग का दौर एक मैनिया की तरह उभरकर सामने आया है। अब आफिसों में काम के बजाय मीटिंग ज्यादा होती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकतर मीटिंगों का मकसद कामकाज को सही पटरी पर लाना होता है, लेकिन मीटिंग का फैशन ऐसा चल निकला है कि अब कामकाज ही ठप्प होता जा रहा है। बॉस मीटिंग के जरिये अपने अधीनस्थों पर रौब गांठते हैं तो वहीं अधीनस्थों को काम से बचने का अच्छा बहाना मिल जाता है। यही वजह है कि सप्ताह में तीन या चार दिन मीटिंग होना जरूरी सा हो गया है।

संरचनात्मकता एवं काम करने की क्षमता को ऊंघते हुए बेकार कर देते हैं
मीटिंग मैनिया से सबसे ज्यादा नुकसान युवाओं को उठाना पड़ रहा है। वे अपनी संरचनात्मकता एवं काम करने की क्षमता को मीटिंग हॉल में ऊंघते हुए बेकार कर देते हैं। जब भी बॉस की तरफ से मीटिंग का फरमान जारी होता है तो आपने अकसर युवाओं के मुंह से यह जुमला सुनने को मिलता है, ‘चलो कुछ खाने-पीने को तो मिलेगा।’ इस तरह के जुमलों से मीटिंग की बढ़ती संख्या एवं घटती प्रासंगिकता का अंदाजा लगाया जा सकता है। 

कार्यक्षमता का प्रयोग करके संस्थान को फायदे पहुंचा सकते हैं
गौर करके देखें, तो 95 फीसदी मीटिंग्स गैर-जरूरी होती हैं। इनका न कोई एजेंडा होता है और न ही शुरू व खत्म होने का समय। नियम-कायदों का तो नामोनिशान तक नहीं। थोड़ी सी चुटकुलेबाजी, थोड़ी सी गर्मागर्मी एवं ज्यादा सी पेट पूजा के साथ ही मीटिंग खत्म हो जाती है। कामकाज में सुधार के लिए किसी ने कोई नया फार्मूला रखा, तो दूसरा उसकी खिल्ली उड़ाकर ऐसा माहौल बना देगा ताकि कोई अन्य कुछ कहने की हिम्मत ही न जुटाये। यही है आजकल की मीटिंग्स का असली चेहरा। ऐसी मीटिंग क्या किसी संस्थान के लिए फायदेमंद हो सकती है? शायद कदापि नहीं। उल्टा नुकसान यह होता है कि जो लोग अपनी कार्यक्षमता का प्रयोग करके संस्थान को फायदे पहुंचा सकते हैं, उनका ज्यादातर समय मीटिंग मैनिया के शिकार लोगों का साथ निभाने में गुजर जाता है। युवाओं को कॅरिअर के कीमती वक्त की तरह बर्बादी का खामियाजा आजीवन भुगतना पड़ता है।

अत्यावश्यक मीटिंग किसी ठोस एजेंडे को लेकर हो
गैरजरूरी मीटिंग्स की बढ़ती संख्या एवं मीटिंग की कार्यप्रणाली ने इनकी प्रासंगिकता पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यह हकीकत है कि मीटिंग किसी भी संस्थान की प्रगति में सहायक होती है। लेकिन ऐसा केवल तभी होता है जब तक अत्यावश्यक मीटिंग किसी ठोस एजेंडे को लेकर हो रही हो। अन्यथा ये मीटिंग संस्थान को विनाश की गर्त में ले जाने के अलावा कुछ नहीं करती। आइये कुछ तथ्यों पर विचार करें जिनकी बदौलत मीटिंग को प्रासंगिकता की कसौटी पर खरा रखा जा सके।
  • यह ठान लें कि बहुत जरूरी होने पर ही मीटिंग बुलायी जाये।
  • मीटिंग का एक ठोस एजेंडा होना चाहिए।
  • एजेंडे के अलावा मीटिंग में फालतू बातों को तरजीह न दें।
  • छोटी-मोटी बातों या फिर किसी बाबत मात्र सूचना देने के लिए मीटिंग न करें।
  • मीटिंग का समय आदि निर्धारित करने से पहले ही सभी से संपर्क कर लें ताकि मीटिंग में सबकी उपस्थिति सुनिश्चित हो सके।
  • कोशिश करें कि मीटिंग कम से कम समय में समाप्त हो जाये।
  • मीटिंग में नये विचारों को प्रमुखता दी जानी चाहिए।
  • सभी का पक्ष रखा जाना चाहिए ताकि बाद में कोई अपनी अवहेलना का इल्जाम न लगाये।
  • मीटिंग की आवश्यक कार्रवाई के पूर्ण होने पर ही चाय-नाश्ते आदि की बाबत सोचा जाना चाहिए।
  • सभी के सामने स्पष्ट होना चाहिए कि अपना तर्क-वितर्क कम से कम शब्दों में सारगर्भित भाषा में दें।
  • मीटिंग में तू-तू, मैं-मैं की नौबत कतई पैदा न होने दें।
  • निर्धारित समय में मीटिंग पूरी करने का प्रयास करें। #

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