आखिर कैसे करें शुद्ध जल की समस्या का समाधान? जानिए कुछ खास तरकीब...


कृषि, जनसंख्या की वृद्धि तथा अन्य कारणों से काफी मात्रा में शुद्ध जल मिलना कठिन होता जा रहा है। उपलब्ध शुद्ध पानी की मात्रा निरन्तर घटती जा रही है साथ ही साथ उसके साधन स्त्रोत भी कम होते जा रहे हैं। वस्तुतः अब यह समस्या ग्रीष्म तक ही सीमित नहीं रह गई है। विकासशील देशों में भी प्रति व्यक्ति पानी का उपयोग बढ़ता जा रहा है। शुद्ध जल के स्त्रोत दिन पर दिन अशुद्धि से पूर्ण होते जा रहे हैं। कृषि में उर्वरकों के उपयोग के कारण अन्न-उतपादन के लिए पानी की आवश्यक्ता बढ़ती जा रही है। क्योंकि शुद्ध जल के साधन सीमित हैं। इस समस्या के हल के दो मार्ग है या तो हम इसके उपयोग में मितव्ययिता करें, या कृत्रिम रूप् से अधिक जल का उत्पादन करें। पर प्रथम मार्ग संभव नहीं है।

बढ़ रही दिनोंदिन जल रिसाइकल की मांग

यदि हम पानी की किफायत करेंगे तो उत्पादन घटिया होने लगेगा। अतः यह आवश्यक है कि शुद्ध जल की मात्रा बढ़ाई जाए। जो जल अशुद्ध हो जाए उसे शुद्ध करके पुनः काम में लिया जाए। इस प्रकार जल को शुद्ध करने से हमें जल भी मिलेगा और साथ में कुछ अन्य काम की चीजें भी मिल जाएंगी। प्रतयेक उद्योग में अशुद्ध जल को शुद्ध करने के लिए अलग-अलग उपाय काम में लाने होंगे। किसी उत्पादन में अशुद्ध हुए जल को पुनः शुद्ध करने के बाद उसी उद्योग में या अन्य किसी उद्योग में काम में लाया जा सकता है। जल को शुद्ध करने के लिए अवयतन इत्यादि पद्धतियां अपनाई जा सकती है।

पानी के साथ बहने वाली गंदगी पर नियंत्रण पर करने की है आवश्यकता

जल को शुद्ध करने के लिए योजना प्रत्येक उद्योग अपने कार्यक्रम में स्वयं या सरकारी सहायता से चला सकता है। ताकि उद्योग से निकलने वाली अशुद्धता का उपयोग कर सके। उसका एक अन्य लाीा यह होगा कि एक सहायक उद्योग खड़ा हो जाएगा। अन्यथा पानी के साथ मिली हुई जो गंदगी नदियों इत्यादि में मिलती है। उससे स्वास्थ्य को हानि पहुंचती है, उसे पानी से पृथक करके उसके द्वारा कोई लाभदायक उत्पतादन किया जा सकता है। अतः पानी के साथ बहने वाली गंदगी पर नियंत्रण कर के उसका सदुपयोग करना बहुत ही आवश्यक है। एतदर्थ नदियों के पानी में गंदगी गिराने पर कानून द्वारा प्रतिबंध लगना चाहिए। यदि कोई उद्योग ऐसा करे तो उसका लाइसेंस जब्त करके या अन्य प्रकार से उसे दण्डित करना चाहिए। किसी नए उद्योग की रूपरेखा बनाते समय ही उससे निकलने वाली गंदगी को काम में लाने की भी योजना बन जानी चाहिए ताकि प्रमुख उद्योग के साथ सहायक उद्योग के रूप में वह भी चल सके।

मल निस्त्राव

उत्पादनों से निकले मल निस्त्रावों को उएप-उत्पादनो के लिए काम में लेने का प्रश्न महत्वपूर्ण है। रेयन उद्योग के जल निस्त्राव से सोड़ियम सल्फेट प्राप्त होता है जिसका उपयोग कर के सल्फारिक एसिड या ब्लीचिंग लिकर का उत्पादन किया जा सकता है। सूती कपड़े की मिलों में कप्ड़े को मर्सराइज करने के लिए जो प्रक्रिया की जाती है उसके अशुद्ध निस्त्राव से कास्टिक सोडा प्राप्त किया जा सकता है, जिसे रूपान्तरित कर के पुनः उपयोग के योग्य बनाया जा सकता है। स्टार्च फैक्ट्रियों के मल-निस्त्रावों का उपयोग करके पेनिसिलीन तथा अन्य प्रति जैविक औषधियों का उत्पादन किया जा सकता है।

घरेलू उपयोग के लिए अधिक पानी की आवश्यक्ता होने लगी है

नगरों की गंदगी जो नदियों में बहाई जाती है उसे नदियों में गिरने से पहले यदि शुद्ध कर दिया जाए तो नदियों का जल गंदा नहीं होगा। नालियों के पानी को शुद्ध करने की एक विधी ऑक्सीजनेशन है, जिसकी खोज नागपुर की स्वास्थ्य शोधशाला ने की है। नगरपालिकाओं को इसके लिए प्रारंभिक सरकारों से अनुदान मिलने चाहिए ताकि वे नालों को नदियों में गिरने से पहले शुद्ध करने के यंत्र लगा सकें। नगरों में जीवन का स्तर ऊंचा होने से तथा जनसंख्या में वृद्धि होने से घरेलू उपयोग के लिए अधिक पानी की आवश्यक्ता पड़ने लगी है अतः इस प्रकार के प्रयास होने चाहिए कि लोग पानी को व्यर्थ नष्ट न करें। नालियों का पानी शुद्ध करके भ पनीे के काम में नहीं लाया जा सकता, परन्तु इसकी जांच करनी चाहिए कि वह अन्य किन कामों में आ सकता है। फिर इसके लिए उपयुक्त संयंत्र लगाए जाने चाहिए।

छोटे-छोटे यंत्रों का जितना अधिक उपयोग किया जाएगा उतना ही शुद्ध पानी की किफायत होगी

आजकल विकसित देशों में ऐसे छोटे-छोटे संयंत्र बन गए हैं जो छोटे कस्बों या गांवों  तथा बड़ी बिल्डिंगों में लगाए जा सकते हैं, ताकि वहां की नालियों का पानी शुद्ध होता रहे। इस प्रकार के संयंत्रों से चार-पांच बार तक नालियों का पानी साफ करके पुनः काम में लाया जा सकता है। उसके बाद वह बेकार हो जाएगा और फैंक दिया जाएगा। इस प्रकार के छोटे-छोटे यंत्रों का जितना अधिक उपयोग किया जाएगा उतनी ही शुद्ध पानी की किफायत होगी।

कृषि हेतु वर्षा का जल इकट्ठा करने पर जोर देना चाहिए

कृषि के क्षेत्र में भी शुद्ध जल का उपयोग बढ़ता जा रहा है। उर्वरकों का उपयोग किया जा रहा है तथा बीजों की किस्म में सुधार किया जा रहा है, ताकि कृषि में उन्नति करके अन्न की समस्या हल की जाए। इसके लिए कृषि का विस्तार किया जा रहा है, अतः अधिक पानी की आवश्यकता पड़ रही है। भारी वर्षा होने पर ये लवण फैल जाते हैं, परन्तु फिर भी इनकी अधिक मात्रा हो जोने से भूमि की उर्वरता घटती जा रही है। इसमें कुछ सुधार इस प्रकार किया जा सकता है कि वर्षा का जल इकट्ठा कर लिया जाए और सिंचाई के लिए उसका भी उपयोग किया जाए। ये लवण थोड़ी मात्रा में रहें तो भूमि की उर्वरता के लिए आवश्यक होते हैं। जहां की मिट्टी में इनकी अधिकता है वहां सिंचाइ्र के लिए यदि शुद्ध जल मिल सके तो उसके द्वारा लवणों को फैलाया जा सकता है जिससे भूमि को नया जीवन प्राप्त हो सकता है।

कृत्रिम बादल

मुख्य उपाय यह है कि हम कृत्रिम जल का उत्पादन करें और इसका एकमात्र तरीका यह है कि हम प्रकृति से सीखें, जो कि समुद्र के जल को भाप बनाकर वर्षा के रूप में हमें शुद्ध जल प्रदान करती है, जिसकी हमें अत्यंत आवश्यकता रहती है। कृत्रिम वर्षा के लिए बादलों के बीजन की पद्धति विशेष लाभदायक नहीं है क्योंकि बादलों पर इच्छानुसार वर्षा के लिए नियंत्रण करना संभव नहीं है।

समुद्र 

अतः एकमात्र संभव उपाय यही है कि समुद्र के खारे जल के खारेपन को निकाल कर उसे शुद्ध कर लिया जाए। इस दिशा में जो प्रगति हो रही है, वह काफी उत्साहवर्धक है, परन्तु मुख्य समस्या यह है कि यह पानी काफी महंगा पड़ता है।

इसके लिए वैज्ञानिकों ने अनेक प्रयोग किए है, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित है -

(1) सूर्य की गर्मी द्वारा वाष्प का निर्माण और फिर उस वाष्प से पानी का निर्माण। यह पद्धति केवल उन प्रदेशों में काम में लाई जा सकती है, जहां अधिक समय तक तेज धूप रहती है, तथा इस पद्धति से बड़ी मात्रा में जल का उत्पादन संभव नहीं है।

(2) एक उपाय यह है कि वाष्प-आसवन (डिस्टिलेशन) की साधारण पद्धति अपनाई जाए जिसमसें वाष्प बनाकर फिर उसे पानी के रूप में परिवर्तित किया जाता है। इसके लिए भी अनेक प्रकार के प्रयोग किए जा रहे हैं, परन्तु सभी बहुत महंगे हैं।

(3) एक प्रयोग यह किया जा रहा है कि लवण को सोडियम और क्लोराइड में अयनों में विभाजित कर के पानी को शुद्ध किया जाए। इस पद्धति को यदि सस्ता बनाया जा सके तो आशा है कि यह अपना ली जाएगी।

 (4) डियालिसिस पद्धति इस दिशा में सर्वप्रमुख..... इसमें इलैकट्रानिक से काम लिया जाता है अतः यह महंगी बहुत है। इसी प्रकार के अन्य अनेक प्रयोग किए जा रहे हैं, परन्तु ये सब व्यय साध्य है। ये सभी साधन महंगे होने बहुत सरल नहीं है पर अणु-शक्ति पर लोगों की आशाएं टिकी है, क्योंकि उसके द्वारा कम व्यय में कार्य हो सकेगा। अमरीका में अणु-शक्ति का उपयोग करके जल को शुद्ध करने का समुद्र तट पर एक संयत्र लगाया जा रहा है, जिसके सफल होने पर अन्य देशों को इसी प्रकार के अणु-शक्ति-केन्द्र स्थापित करने की प्रेरणा मिलेगी। बताया गया है कि भारत मद्रास में एक अणु-शक्ति-चालित संयंत्र का निर्माण समुद्री जल के खारेपन को दूर कर के शुद्ध करने के लिए स्थापित करने वाला है।

इस प्रकार हम देखतेे हैं कि आधुनिक तकनीक और विज्ञान ने अपने लिए शुद्ध पानी की समस्या उत्पन्न की है पर उस समस्या का हल भी वे खोज रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हमारी सरकारें इन साधनों की प्राप्ति में पूर्ण योगदान दें। #

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