वृद्ध लोगों की क्या समस्याएं होती हैं? आखिर कितना जानते हैं आप...?


यद्यपि आर्थिक विकास व सामाजिक एवं जनांकिकी स्थितियों के आधार पर काम करने वालों की तुलना में वृद्ध लोगों का अनुपात एक देश से दूसरे देश में पृथक है पर हर देश में ही उनकी संख्या बहुत बड़ी है और सामाजिक अन्तर्चेतना व सामाजिक न्याय के विचारों के विकास के साथ हम उनकी समस्याओं की ओर से आंखें मूंदे नहीं रह सकते। जन्म व मृत्युदर के गिरते हुए आंकड़ों के साथ वृद्ध व्यक्तियों की संख्या बढ़ना लाजिमी होता है और इसके साथ ही उन्हें समाज का उपयोगी अंग बनाये रखने की समस्या भी सामने आती है। औद्योगिक रुप से उन्नत देशों में आर्थिक, मानवीय एवं सामाजिक आधारों पर इन समस्याओं को काफी हद तक महत्त्व दिया गया है और इस दिशा में प्रशिक्षण, मानवीय शक्ति का आयोजन व सामाजिक-संरक्षण की योजनाओं के कदम उठाये गये हैं पर अभी बहुत कुछ करना बाकी है। विशेष तौर से भारत जैसे देशों के लिये इन समस्याओं का समुचित तीव्र हल और भी आवश्यक हो गया है, जहां कि हम आज खेतिहर अर्थव्यवस्था को छोड़कर औद्योगिक अर्थव्यवस्था को अपना रहे हैं।

नगरों में केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति

योजनाबद्ध विकास की हमारी योजनाओं के साथ ग्रामों की आबादी गत दशक में 46 प्रतिशत हर वर्ष कम हो रही है। 1951 में ग्रामों की आबादी 82.86 प्रतिशत थी जो 1961 में 82.16 प्रतिशत रह गई है। तथापि अपनी योजनाओं को तैयार करने व क्रियान्वयन करते समय हमें नगर क्षेत्रों में उद्योगों के केन्द्रीकरण से उत्पन्न होने वाले दोश को भी दृष्टिगत रखना होगा। पुनः ग्रामीण समाज में वृद्धों का जहां तक प्रश्न है - उनके लिये कुछ सीमा तक सुरक्षा प्राप्त है। वहां वृद्ध होने वालों को सड़कों का सहारा नहीं लेना होता है। वे अपने वातावरण या समाज को अनुपयुक्त नहीं पाते। वहां उन्हें वांछित मान-सम्मान प्राप्त होता है और अपनी क्षमता के अनुसार वे अपना कार्य कर सकते हैं।

बुजुर्ग परिवार की आय में योगदान देते हैं साथ ही अपना ज्ञान व अनुभव भी प्रदान करते हैं

भारत जैसे देश में जहां संयुक्त परिवार प्रणाली समाज का महत्वपूर्ण अंग है, परिवार के वृद्धों को अनुपयोगी व व्यर्थ अंग नहीं माना जाता है। परिवार के बुजुर्ग के रुप में वे परिवार की आय में जहां योगदान देते हैं, वहां युवा सदस्यों को ज्ञान व अनुभव भी प्रदान करते हैं। संयुक्त परिवार व्यवस्था में वृद्धों के लिये सामाजिक सुरक्षा की भावना निहित रहती है। यह बात पृथक है कि भारत की जनता की औसत आय को देखते हुए ऐसी सुरक्षा अपर्याप्त होती है। पर जहां बेकारी एवं अर्ध बेकारी की समस्या विशाल मात्रा में मौजूद हैं और हमारे साधन अल्प हैं वहां विकसित देशों के ढंग पर सामाजिक संरक्षण की किसी व्यापक योजना का क्रियान्वित संभव नहीं है।

वृद्ध होने पर भी अपनी क्षमता के अनुसार वे कार्य कर सकते हैं

सहकारी आंदोलन के उत्थान, उद्योगों के विकेन्द्रीकरण एवं संतुलित विकास, एवं गृह उद्योगों के विकास के लिये बनी हमारी योजनाओं में इस बात को ध्यान में रखा गया है कि औद्योगिक देशों में काम कर रहे व्यक्ति वर्तमान सामाजिक व्यवस्था से एकदम पृथक न पड़ जायें क्योंकि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में अपर्याप्त होने पर भी सुरक्षा मौजूद होती है एवं वृद्ध होने पर भी अपनी क्षमता के अनुसार वे कार्य कर सकते हैं।  इस कथन का तात्पर्य यह नहीं है कि हम भारत में जो कुछ कर रहे हैं श्रेष्ठ है, पर यही ऐसा मार्ग दिखाई पड़ता है जिसका अनुसरण विशाल आबादी तथा अल्प साधनों वाले भारत जैसे विकासशील देश द्वारा किया जा सकता है।

वृद्धों के लिये तो काम के अवसर और भी अल्प हैं

हमारी आबादी का बड़ा भाग ग्राम्य क्षेत्रों में रहता है। पर इसके बावजूद औद्योगिक क्षेत्र में भी उसका एक भाग बसता है और बस रहा है। इस क्षेत्र में बसने वाले अनेकों लोगों ने ग्रामीण समाज के मूल आधारों को अपनाया है। पूर्ण रोजगार वाली अर्थव्यवस्था में ही अल्प क्षमता वाले लोगों को किसी न किसी कार्य में लगाया जा सकता है पर हमारे देश के लिये पूर्ण रोजगार की स्थिति अभी बहुत दूर की बात है। रोजगार की सुविधाओं के विस्तार के बावजूद हम बढ़ती हुई आबादी की मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं और जहां यह स्थिति है कि युवकों को ही काम नहीं मिल पाता, वहां वृद्धों के लिये तो काम के अवसर और भी अल्प हैं।

वृद्धों के जीवन को सुखी व निर्वाह योग्य बनाने के लिये बहुत कुछ करना अभी बांकी है

हमारे साधनों के सीमित होने के कारण अभी बहुत समय तक वृद्धों के लाभ के लिये सामाजिक संरक्षण की कोई व्यापक योजना चलाना संभव नहीं होगा। तथापि कार्यमुक्ति के अनन्तर मजदूरों को प्रोवीडेन्ट फन्ड प्रदान करने के लिये हमने कई योजनायें प्रारंभ की हैं। कुछ जगहों पर ग्रेच्युटी या पेंशन की भी व्यवस्था है। कर्मचारी राज्य बीमा योजना के अंतर्गत कुछ उद्योगों में कर्मचारी व उनके परिवारों को चिकित्सा-सुविधा भी प्रदान की जाती है। कोयले की खानों व बागान में उस तरह की सुविधायें उपलब्ध हैं। ये योजनायें निःसंदेह बहुत उत्तम व लाभकारी हैं। अतः हमारे वृद्धों के जीवन को सुखी व निर्वाह योग्य बनाने के लिये बहुत कुछ करना अभी बांकी है। अब तक जो कदम उठाये गये हैं वे इसी मान्यता पर आधारित हैं कि वृद्धों के निर्वाह का प्राथमिक उत्तरदायित्व परिवार के युवा सदस्यों पर है।  #

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