जड़ी-बूटियों की उपयोगिता बढ़ती जा रही है, जानिए कैसे बढ़ रहें हैं रोजगार के अवसर



भारतीय चिकित्सा प्रणाली मे जड़ी-बूटियों का प्रचलन पुराने समय से चला आ रहा है इसलिए जड़ी-बूटियों की उपयोगिता, दिन-प्रतिदन बढ़ती जा रही है। इनके उपयोग से बीमारियों का निदान स्थाई रूप से होता है तथा सेवन से शरीर में किसी भी प्रकार का हानिकारक असर नहीं होता है। एक ही जड़ी-बूटियों विभिन्न प्रकार की बीमारियों मे मनुष्यों तथा जानवरों दोनों की बीमारी के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकती है परन्तु इसकी जानकारी तथा सेवन-विधी का अच्छा ज्ञान होना अति आवश्यक है। आयुर्वेद चिकित्सा प्रणाली पूर्णतः जड़ी-बूटियों के सेवन पर ही आधारित है।


जड़ी-बूटियों के रूप में प्रयोग आने वाले पौधों की पहचान होना अति आवश्यक है। विश्व में विभिन्न पौधों की लगभग 130 लाख प्रजातियां हैं जिनमें से केवल 17.50 हाजार प्रजातियों की ही पहचान हो पाई है। शेष 88 प्रतिशत प्रजातियों की पहचान करना अति आवश्यक है। जिनका प्रयोग औषद्यालयों में दवाई के रूप में किया जा सके। 


वैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार 12 प्रतिशत प्रजातियों की पहचान हो चुकी है। इनमें से भी कुछ अब लुप्त हो रही हैं जिनका संरक्षण करना अति आवश्यक है। यह जड़ी-बूटियां प्राय जंगलों से एकत्रित की जाती है, पर हमारे देश में जंगलों का तेजी से कटाव हो रहा है और इसी के साथ-साथ कई अमूल्य प्रजातियां जिनमें जड़ी-बूटियां मुख्य है, अदृश्य होती जा रही है। जंगलों के संरक्षण के साथ ही जड़ी-बूटियों का संरक्षण भी जुड़ा हुआ है।


हमारे देश में पौधों की लगभग 45 हजार प्रजातियां उपलब्ध है और इनमें से करीब 2 हजार प्रजातियां औषधियों से संबंधित है जिनका संरक्षण तथा औषधि र्के रूप में प्रयोग की तकनीकी जानकारी उपलब्ध है। जब तक जड़ी-बूटियों के बारे में पर्याप्त जानकारी व सूचनाएं आम आदमी तक नहीं होगी, तब तक इनकी उपयोगिता और संरक्षण का महत्व वे नहीं जान पाएंगे।


ग्रामीण क्षेत्र में जड़ी-बूटियों की खेती, सरंक्षण व विपणन आदि की जानकारी देने की व्यवस्था होनी चाहिए। उनके विपणन के लिए देश में ही काफी मांग है। आयुर्वेद व यूनानी फार्मेसियों को जड़ी-बूटियों की काफी जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्रों में इन प्रजातियों के उगाने व प्रचलन को बढ़ावा देने के लिए व रोजगार के अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से किसानों को इसकी भली-भांति जानकारी देना जरूरी है। इसकी पैदावार से होने वाली आय, आम फसल उगाने की आय से अधिक होती है। 


किसानों को जड़ी-बूटियों के उगाने के साथ-साथ विपणन की पर्याप्त जानकारी देना जरूरी है। जब किसानों को यह विश्वास हो जाएगा कि यह भी रोजगार का एक माध्यम है तो वह स्वयं ही इस रोजगार से जुड़ने लगेंगे। इन प्रजातियों का संरक्षण बहुत जरूरी है। 


कैंसर की दवा में प्रयोग में लाए जाने वाले टैक्सास की सिर्फ दस ग्राम मात्रा प्राप्त करने के लिए पूरे पौधे को नष्ट कर दिया जाता है। इसे बनने में 60 साल का समय लगता है। ऐसे वृक्षों को काटने से पहले इनके कई पौधे लगाए जाने जरूरी है। अगर टैक्सास पौधों को इसी तरह से नष्ट किया जाता रहा तो अगले कुछ वर्षों में यह कैंसर अवरोधी प्रजाति ही समाप्त हो जाएगी। अट्ठारह सौ वर्षों से तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर होने वाले इस पौधे के सरंक्षण की जिम्मेदारी सभी संबंधित क्षेत्रों को निभानी होगी।


जड़ी-बूटियों की पैदावार से कई गुना आमदनी अन्य फसल की तुलना में अधिक होती है। केसिया टोरा का बीज रुपए 1.50 प्रति किलो के हिसाब से खरीदकर विदेशों को भेजा जा रहा है। दिल्ली के खारी बावली बाजार पर मार्केटिंग के कला पर निर्भर रहना उचित नहीं है। इसके लिए सहकारी समितियों के माध्यम से विपणन व्यवस्था करके अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। ऐसे  वयवसायों के लिए केन्द्रीय मंत्रालयों से भी सहायता प्रदान की जाती है। वर्तमान में जड़ी-बूटियों के मार्केटिंग में चंद लोगों का वर्चस्व है। इसलिए किसान इनकी खेती करने में हिचकिचाते हैं। अगर उत्पादन की खरीद सुनिश्चित हो जाए तो पैदावार में कई गुना वृद्धि हो सकती है।


किसानों को जड़ी-बूटियों से बनने वाले दवाओं के फायदे जानना जरूरी है। जिससे इनका उत्पादन बढ़ाया जा सके तथा किसानों का रूझाान इस दिशा में बढ़ाया जा सके। स्थानीय स्तर पर पैदा हाने वाली जड़ी-बूटियों की खरीद भी स्थानीय एजेंसियों द्वारा होनी चाहिए। कुछ कंपनियां इनकी खरीद कर रही है। जैसे डॉबर ने भृंगराज, आंवला, श्यामा, तुलसी व अश्वगंध लने की स्वीकृति अनुग्रामीण संस्था ने किसानों को भी इनकी खेती करने के लिए उत्साहित किया है।


जड़ी-बूटियों का कृषिकरण करके इसकी पैदावार व्यापक स्तर पर होनी चाहिए। इस कार्यक्रम को डॉबर व ऐसी अन्य आयर्वेदिक संस्थानों ने आंदोलन के रूप में लिया है। अनुग्रामीण संस्थान के एक सर्वेक्षण के अनुसार कुछ ऐसी प्रजातियां व अनेक बीज हैं जिनकी मांग निश्चित है। जैसे-जामुन की गुठली, पीपल, छोटी आमला, अरंडी, गुडहल का फूल व जड़, अश्वगंधा, लाजवंती, धनिया, धतूरा काला, ईसबगोल, तुलसी, श्यामा, गिलोय, गैंधी, गुलाब का फूल, अर्जन, आपाजाय, भृंगराज (जलभंगरा)  आमलताज्ञ, ब्राह्मी, गौचो, पुनर्नवा, हार श्रंगार फूल, सतावरी, सिरस, सौजना, धूंखावली, अजमोद, मुस्कदाना आदि। इसके अलावा अनेक औषधि वाले पौधे ऐसे हैं जिनकी पैदावार की बिक्री निश्चित है। किसानों को अधिक आमदनी प्राप्त करने के उद्देश्य से इनके संसाधन तथा संयंत्र भी ग्रामीण क्षेत्रों में भारत सरकार व प्राइवेट एजेंसियों द्वारा लगाए जाने चाहिए। जिससे किसान की प्रति हैक्टेयर आमदनी में वृद्धि हो सके। #

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