काली मिर्च जिसने बदल डाला विश्व का इतिहास? जानिए आखिर कैसे हुआ .....


भारत को इस बात का गर्व है कि उसने विश्व-संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया है। उसने पूर्वीय जगत की संस्कृति को एक आध्यात्मिक-प्रवृत्ति प्रदान की तथा दक्षिणी-पूर्वी और मध्य एषिया के देशों को सभ्यता का पाठ सिखाया। महान सम्राट अशोक के समय से लेकर अरब जातियों के द्वारा इस्लाम के प्रसार तक फारसी से जापान और मंगोलिया से सीलोन तक सभी देशों में बौद्ध-धर्म व्यापक तौर पर फैला व पनपा। बुद्ध के देश के रूप में भारत इस विस्तृत सांस्कृतिक साम्राज्य का मूल-उद्गम और प्रधान केन्द्र था। देवानाम-प्रिय सम्राट अशोक ने पश्चिमी देशों में भी अपने धर्मदूत भेजे थे, परंतु वहां भारत का आध्यात्मिक संदेश अधिक प्रभाव नहीं डाल सका तथा बुद्ध महान का नाम भी बहुत कम लोग जान पाये। प्राचीन और मध्यकालीन योरोप में भारत को प्रसिद्धि काली-मिर्च ने दी।

प्राचीन रोम में काली मिर्च-हीरे के समान प्रतिष्ठित मानी जाती थी

कहा जाता है कि जब अलेरिक गोथ ने 408 ई. में रोम पर आक्रमण किया तो रोमवासियों ने उसे 3000 पाउन्ड काली-मिर्च देकर रोम का धेरा उठाने के लिये मनाया था। उस समय केरल मे इतनी मिर्च केवल सौ रुपये में मिल जाती थी, परंतु यूरोप में यह रोमन-साम्राज्य का मूल्य थी। प्राचीन रोम में काली मिर्च-हीरे के समान प्रतिष्ठित मानी जाती थी तथा उसे भारत के काले सोने के नाम से पुकारा जाता था। कोई भी रोमन दावत तब तक अधूरी मानी जाती थी जब तक कि उसमें काली मिर्च डालकर बनाया गया कोई सुस्वाद पकवान न परोसा जायेष साथ ही कोई भी रोमन महिला अपने रसोई-भंडार को तब तक पूर्ण नहीं मानती थी जब तक कि उसमें काली-मिर्च का एक पैकेट न हो।

कैन्गेनोर काली-मिर्च के निर्यात का प्रसिद्ध बन्दरगाह था

रोमन साम्राज्य के काली-मिर्च का व्यापार इतना अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था कि उसके संरक्षण के लिये विशेष व्यवस्थायें की गई थीं। तीसरी शताब्दी के रोमन इतिहास से ज्ञात होता है कि कोचीन के निकट केन्गेनोर में लगभग 2400 रोमन सैनिक रहते थे। कैन्गेनोर काली-मिर्च के निर्यात का प्रसिद्ध बन्दरगाह था। वहां बहुत से रोमन नागरिक भी रहते थे तथा आगस्टस सीज़र का एक मंदिर भी बनाया गया था।

वह व्यक्ति कौन था जिसने सबसे पहले काली मिर्च पर प्रयोग करके देखा होगा

भारत के साथ काली-मिर्च का व्यापार करने में रोमन साम्राज्य को भारी हानि उठानी पड़ती थी। साम्राज्य के हिमायती काली-मिर्च के प्रयोग की कटु निन्दा करते थे। प्लिनी ने काली-मिर्च के विषय में बहुत ही कठोर भाषा में एक जगह लिखा हैं- यह देखकर बहुत आश्चर्य होता है कि काली-मिर्च का प्रयोग कैसे इतना अधिक चलन में आ गया। मानव-स्वभाव का यह नियम है कि हम वस्तुओं की ओर तक तब आकर्षित होते हैं जब वे सुन्दर हो या उपयोगी हो। परंतु काली मिर्च में तो इन दोनों में से कोई भी गुण मौजूद नहीं थे। फल अथवा बेर खाने में अच्छे होते हैं, परंतु काली-मिर्च का केवल एक ही गुण है कि वह तीखापन पैदा करती हैं तथा उसके इसी अवांछनीय तत्व के कारण हम भारत जैसे सुदूर देश से उसका इतनी बड़ी मात्रा में आयात करते हैं। मुझे विस्मय होता है कि वह कौन प्रथम व्यक्ति रहा होगा जिसने एक खाद्य-पदार्थ के रूप में काली मिर्च पर प्रयोग करके देखा होगा। वह कौन व्यक्ति था जो अपनी स्वाभाविक भूख से संतुष्ट न रह सका होगा और उसने काली-मिर्च के प्रयोग द्वारा अपनी क्षुधा को उत्तेजित करने की चेष्टा की होगी?

अरब लोगों ने यूरोप और भारत के बीच काली-मिर्च के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर लिया 

प्लिनी का तर्क तो अच्छा है, क्योंकि मनुष्य में खाने और पीने की प्रायः अधिकांश वस्तुओं को उनके पोषक तत्वों के कारण ग्रहण किया जाता है, एवं इस दृष्टि से काली-मिर्च तनिक भी वांछनीय नहीं मानी जा सकती है। परंतु मनुष्य केवल तर्क के आधार पर ही नहीं जीता है। आम लोगों में यह धारणा है कि काली-मिर्च में कुछ औषधि-तत्व भी हैं - वह क्षुधा को तो उत्तेजित करती है। पेट और हर प्रकार की गड़बड़ी को भी ठीक करती है। पेट पर काली-मिर्च का चाहे जो भी प्रभाव होता हो, लेकिन विश्व इतिहास पर उसके प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता है। रोमन साम्राज्य के पतन तथा इस्लाम के अम्युदय के साथ ही अरब लोगों ने यूरोप और भारत के बीच काली-मिर्च के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर लिया और यूरोप को काली-मिर्च उनके द्वारा निर्धारित शर्तों के आधार पर ही ले सकते थे। यूरोप के लोगों को काली-मिर्च के व्यापार पर यह अरब-आधिपत्य बहुत खलने लगा। 

यूरोप ने भारत से काली-मिर्च का सीधा व्यापार आरंभ करने की चेष्टा की

अरबों ने यूरोप को काली-मिर्च देना कम कर दिया था। जिसके कारण यूरोप की पाक कला का ह्रास होने लगा और सम्राटों, राजाओं और मध्यकालीन डाकू-सरदारों के भोज निस्वाद होने लगे थे। यूरोप ने भारत से काली-मिर्च का सीधा व्यापार आरंभ करने की चेष्टा की। परंतु पूर्व की ओर जाने वाले समुद्र के द्वार पर सुदृढ़ तुर्क जाति का नियंत्रण था, तथा उससे बचकर भारत जाने का केवल एक ही उपाय था कि यूरोप से भारत के लिये कोई नया मार्ग खोजा जाये। यहां से यूरोप के लोगों द्वारा की गई महान खोजों का वह युग आरंभ होता है, जिसने विश्व इतिहास को बहुत बड़ी मात्रा में प्रभावित किया है।

कोलम्बस और उसकी विफलता

भारत के लिये नये मार्ग की खोज करने के लिये नाविक सारी दिषाओं में निकल पड़े। कोलम्बस ने पृथ्वी की गोलाई के सिद्धांत के आधार पर पूर्व में पहुंचने के लिये पश्चिम की ओर जाना आरंभ कर दिया। वह भारत तो नहीं पहुंच सका, तथापि वेस्ट इंडीज तथा रेड-इंडियन्स आदि नाम उसकी कुंठा के प्रमाण बन गये हैं। कोलम्बस की विफलता से यूरोप शांत नहीं हुआ। 

‘वास्को डि गामा’ भारत पहुंचने वाला पहला यूरोपियन था

भारत को खोजने की नई चेष्टा आरंभ हुई। मैगलन ने कोलम्बस के सिद्धांतों का अनुसरण करके पृथ्वी का चक्कर काटने में सफलता प्राप्त कर ली। इससे पहले आशावान बार्थोलोम अफ्रीका के दक्षिण में पहुंच गया परंतु वह दुर्भाग्यवश उत्तर की ओर मुड़ गया। आशा-अंतरीप को पहली बार ‘वास्को डि गामा’ ने पार किया, तथा वह भारत पहुंचने वाला पहला यूरोपियन था। यह महान साहसी नाविक 1498 में दुर्दम सागर का सामना करते हुए कालीकट पहुंचा। यह उसका सौभाग्य था कि वह सीधे काली-मिर्च के प्रदेश में ही जाकर उतरा। 

अरब के एकाधिकार व्यावसायिक घरीने दिवालिए हो गए

इस समाचार से यूरोप में एक वित्तीय संकट उपस्थित हो गया, तथा अरबों के साथ काली-मिर्च के व्यापार पर एकाधिकार रखने वाले अनेक व्यावसायिक संस्थान पल भर में दिवालिये हो गये। शीघ्र ही पुर्तगालियों ने अरबों को अरब सागर से खदेड़ दिया, तथा काली-मिर्च का व्यापार पुर्तगाल सम्राट के एकाधिकार में आ गया। अपने व्यापारिक मार्गों की रक्षा करने के लिये पुर्तगालियों ने दूसरे देशों में अपनी सैनिक छावनियां स्थापित कीं। उनके बाद ब्रिटिष, डच और फ्रेंच भी आये, तथा उससे आगे का इतिहास आधुनिक कालीन इतिहास का सर्वविदित अंश है। 

तीखी, काली और मानवीय उपयोग को क्यों नहीं फेंका

भारत के के दक्षिण भाग में बसे केरल की इस छोटी सी काली-मिर्च ने जिस प्रकार इतिहास की धाराओं को गति दी है, उसको देखकर मन में यह सवाल उठता है कि यदि प्लिनी के उस प्रथम मनुष्य ने जिसने काली मिर्च को पहली बार चखा था, उसने यदि तीखी, काली और मानवीय उपयोग के लिए अनुपयुक्त भद्दा बीज कहकर फेंक दिया होता तो विश्व इतिहास ने न जाने क्या रूप लिया होता? #

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