मौसम के पूर्वानुमान हमेशा ही गलत निकलते हैं, मौसम के नियमन की समस्याएं क्या हैं?


मौसम के पूर्वानुमान हमेशा ही गलत निकलते हैं। केवल भारतवर्ष में ही नहीं, और जगह भी ऐसी धारणा है, कुछ साल हुए मैंने अपने देश के एक स्थानीय और जिम्मेदार महानुभव को यह कहते भी सुना कि मौसम विभाग को बंद क्यों न कर दिया जाए? हमारे मौसम के पूर्वानुमान 80 प्रतिशत सही निकलते हैंः उड्ड्यन के लिए किए गए पूर्वानुमान 90 प्रतिशत सही निकलते हैंः यह दुर्भाग्य की बात है (यद्यपि स्वाभाविक भी है।) कि लोगों को केवल वे ही पूर्वानुमान याद रह पाते हैं जो गलत निकल जाते हैंः

पूर्वानुमान जो कई बार झूठे पड़ जाते हैं

लगभग 20 प्रतिशत पूर्वानुमान जो वाकई झूठे पड़ जाते हैं, उसका कारण है प्रकृति की सनक जैसे उष्ण कटिबंधीय तूफान का अचानक अपनी दिशा बदलना है। उष्ण कटिबंध में हमारे सामने एक और समस्या आ जाती है। इस कटिबंध में मौसम स्थानीय होता है, उदाहरण के तौैर पर एक निश्चित समय पर जबकि दक्षिण-दिल्ली आंधी-पानी के क्षेत्र में होगी, उत्तर -दिल्ली उससे बाहर हो सकती है, इससे यह हो सकता है कि एक महानगर में जिस समय एक क्षेत्र में पानी बरस रहा हो, दूसरा क्षेत्र बिल्कुल सूखा रह जाए। ऐसा इसलिए होता है कि उष्ण कटिबंध का मौसम पुंजीभूत मेघों से बनता है, चादर की तरह आच्छादित मेंघों से। एक बात यह भी समझने की है कि एक विशिष्ट स्थान का मौसम बनाने में जिन परिस्थितियों का हाथ होता है, वह बहुत दूर होती है। भारत में मौसम जिन परिस्थितियों पर निर्भर करता है, वह सैकंडो मील दूर हो सकती है और फिर मौसम की सनक के लिए तो तैयार रहना ही पड़ता है।

मौसम का सुधार

परन्तु हर बार प्रकृति का ही वश चले, यह जरूरी नहीं है। वस्तुतः कुछ समय से मनुष्य कृत्रिम साधनों द्वारा मौसम को अपनी स्थानीय आवश्यक्ताओं के अनुकूल ढालने में सफल रहा है। जबसे मौसम सुधार की प्रक्रिया व्यावहारिक पाई गई है, इसे विभिन्न उद्देश्यों के लिए लागू किया गया है, अर्थात् कृत्रिम वर्षा के लिए सृजन के लिए हवाई पृष्इों पर कोहरा हटाने के लिए, ओलावृष्टि का इमन करने के लिए और उष्णकटिबंधीय समुद्री तूफानों की प्रवरता घटाने के लिए विशेषज्ञ इन दिशाओं में कार्यरत हैं- मुख्यतः अमेरिका, इंग्लैण्ड, सोवियत संघ, आस्ट्रेलिया और भारत में।

कृत्रिम वर्षा

भारत में 10 वर्षों से दिल्ली-आगरा, जयपुर क्षेत्र में हमें कृत्रिम वर्षा प्राप्त होती रही है, यह वर्षा स्थल-आधारित परियोजनाओं द्वारा प्रक्षिप्त चूर्ण का घोल रूपी सामान्य नमक की सहायता से बोये गए बादलों के द्वारा होती है। मद्रास में भी ऐसे ही परीक्षण करने की योजनाएं हैं जहां कि आमतौर पर सूखास्थिति विद्यमान रहती है। हम विमान से वैकल्पिक बादलों की उत्पत्ति का प्रयास करने वाले हैं। ऐसे बादलों की उत्पत्ति से हम उस क्षेत्र की वर्षा में 22 से 30 प्रतिशत की वृद्धि करने में में समर्थ रहें हैं। कुछ लोग इस आशंका से आपत्तियां उठाते हैं कि किसी एक क्षेत्र में कृत्रिम वर्षा का प्रयास होन से शून्य क्षेत्रों की वर्षा में कमी आ सकती है। ऐसी आपत्तियां  के निराकरण के लिए हम समस्त संभव सर्तकता बरत रहें हैं। हम ये विधियां केवल उन्हीे क्षेत्रों में प्रयुक्त करेंगे जहां बादलों से वर्षा  न हो रही है। वर्षा-निर्माण के अतिरिक्त हम कलकत्ता हवाई अड्डे पर कोहरा निवारण की योजना बना रहें हैं।

मानव प्रभाव

मौसम पर मनुष्य की गतिविधियों का क्या प्रभाव होता है, इस संबंध में हमारा कोई स्पष्ट विचार नहीं है। एक अनुमान के अनुसार वायुमंडल की कार्बनडाइआक्साइड दस लाख में 600 अंश से बढ़कर दस लाख में 340 अंश तक पहुंच गई है। इसका अर्थ यह है कि विगत सात दशकों में इसमें लगभग 13 प्रतिशत वृद्धि मान ली जिसे कि 300 से 600 अंश हो जाती है तो इससे पृथ्वी धरातल के औसत तापमान में 2 अंश सेंटीग्रेड की वृद्धि हो जाएगी। इसमें अधिक वृद्धि होने के परिमाणस्वरूप् ध्रुवखण्ड अत्याधिक गर्म होकर पिघलते लगेंगे, जिससे महासागरों के स्तर  में भी वृद्धि हो जाएगी। दूसरी ओर में विचार भी व्यक्त किए जाते हैं कि इसमें धु्रवखंडों का विस्तार हो सकता है। 

जलवायु में परिवर्तन

पश्चिमी समुद्रतट पर मंगलौर के उत्तर तक होने वाली वर्षा इस शताब्दी के आरंभ से लगभग 30 प्रतिशत वृद्धि हुई है। यह नहीं कहा जा सकता कि यह प्रवृत्ति जारी रहेगी या नहीं, यह समस्त भूमंडल के किसी वायुमंडलीय संचार से संबंधित हो सकता है। परन्तु भारत की जलवायु समग्र रूप में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है।

पूर्वानुमान में सुधार

विश्वव्यापी मौसम पर्यवेक्षण के कार्यक्रम में तेजी लाई जा रही है। वाशिंगटन, मास्को और मेलबोर्न में स्थापित तीन विश्व मौसम विज्ञान केंद्र और 16 अन्य क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केन्द्र मौसम से संबंधित विश्वव्यापी सूचना इकट्ठी करके उनका विश्लेषण किया करेंगे ताकि अल्प-समय और अधिक लंबे समय के लिए मौसम के पूर्वानुमान दुनियाभर में सब जगह प्राप्त हो सकें।

हिंद महासागर का अध्ययन

वर्ष 1963-64 में एक अंतर्राष्ट्रीय हिंद महासागर अभियान परिचालित किया गया था। उस समय भी सागर और वायुमंडल दोनों के विषय में पर्याप्त सूचना इकट्ठी की गई थी। उस कार्यक्रम के अंर्तगत बंबई में एक अंतर्राष्ट्रीय मौसम-विज्ञान केन्द्र खोला गया था और वहां कोलाबा में एक स्वचालित चित्र-संचारण यंत्र लगाया गया था। वह यंत्र तब से बराबर काम कर रहा है और दिन-रात मौसमी उपग्रहों से मौसम के तात्कालिक चित्र ग्रहण करता रहता है। वर्ष 1976 में विश्व-व्यापी परीक्षण किया जाएगा जिसके अंर्तगत 36000 किलोमीटर की ऊंचाई पर एक स्थिर उपग्रह छोड़ा जाएगा। जो हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व-एशिया के क्षेत्र के मौसम का पर्यवेक्षण करेगा और उसकी सूचना देगा। इससे हमें भारतीय मानसून और उष्ण-कटिबंधीय इलाकों का अध्ययन करने की दिशा में बहुत लाभ होगा। जिससे हम देश के अल्पकालिक और मध्यमकालिक पूर्वानुमान काफी मात्रा में सुधार कर पाएंगे।

मौसमी उपग्रह

आजकल जो उपग्रह का काम कर रहा है वह अमरीका द्वारा छोड़े गए उपग्रहों के क्रम में है। यह उपग्रह रोज दो बार-एक बार सुबह से पहले और एक बार अपरान्ह से पहले भारत के ऊपर से गुजरता है, उपग्रह का टेलीविजन कैमरा मेघपुंजो के चित्र लेता रहता है। ये चित्र स्वचालित चित्र संचरण व्यवस्था द्वारा भेज दिए जाते हैं। हमारी नई-दिल्ली, बंबई, कलकत्ता, मद्रास और पूना की वैधशालाओं में इन चित्र तरंगों को पकड़ लिया जाता है और चित्र उभार लिए जाते हैं। इन चित्रों से हमें मेध-पुजों के बारे में अतयन्त उपयोगी सूचना मिल जाती है जिससे मौसम के पूर्वानुमान में मदद मिलती रहती है और तूफानों का भी समय रहते पता लग जाता है।

स्थिर स्तरीय गुब्बारे

दक्षिणी गोलार्द्ध में पानी प्रचुर है और उड्डयन नहीं के बराबर वहां से वायुमंडलीय सूचनाएं इकट्ठी करने के लिए प्रचुर दबाव वाले स्थिर स्तरीय गुब्बारे के साथ सफल परीक्षण किए गए हैं। ये गुब्बारे पवन-धाराओं के साथ-साथ भूमंडल केे चारों ओर चक्कर काटते रहते हैं। ये गुब्बारे भू-मंडलीय समानांतर पर्यवेक्षण तकनीक के कार्यक्रम के अंर्तगत उड़ाये गए है। अभी हाल ही एक नई पद्धति विकसित हुई है जिसके जरिये यह संभव हो गया है कि पृथ्वी से दिए गए निर्देश पर 30 किलोमीटर की ऊंचाई पर तैरते हुए ‘पितृगुब्बारेय’ से छूटकर एक ‘बाल-गुब्बारा’ निर्दिष्ट ऊंचाई तक गिरे और उसके साथ लगे हुए यंत्र से जो सूचना इकट्ठी हो जाए। इस तरह हमें एक निर्दिष्ट-स्तर के तापमान, दबाव और नमी के विषय में सही और तात्कालिक सूचना मिल जाती है।

मानसून की रूप-रेखा

अरब सागर में मानसून का अध्ययन किया जाए। जिसमें पानी के जहाज और हवाई जहाजों का उपयोग करके  वायुमंडलीय तापमान का अध्ययन किया जाए और अन्य महत्वपूर्ण सूचनाएं भी इकट्ठा किया जाए जिसकी मदद से भारतीय मानसून की रूपरेखा के विषय में अधिक और सटीक जानकारी मिल पाएगी। #

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