दूसरों को स्कैन करने से बेहतर है कि खुद को आईने में देखें? जानिए कुछ खास बातें...


पिछले दिनों दीपिका की तबियत खराब हो गई। हालांकि उसे हल्का बुखार था और सिर में भी पूरे दिन दर्द बना रहा। इससे दीपिका को लगा कि उसे कोई गंभीर रोग हुआ है। डॉक्टर ने चैकअप के बाद उसे दवा दी और कहा कि तुम जल्द ठीक हो जाओगी। इसमें कोई फिक्र की कोई बात नहीं है और हां, तनाव मत लेना। लेकिन दीपिका को लगा कि डॉक्टर उससे कुछ छिपा रहे हैं। इसी टेंशन में दीपिका का मामूली बुखार 15 दिनों तक बना रहा और बार बार ब्लड टेस्ट करवाया गया। पर हमेशा परिणाम नेगेटिव रहा। अंततः डॉक्टर ने दीपिका को गुस्से और कोफ्त में कहा कि यह बीमारी तुम्हारी अपनी बुलाई हुई है, तुममें ठीक होने की चाह नहीं है।

असफल लोग न केवल दूसरों के मूल्यांकन में बल्कि अपने मूल्यांकन में भी बेइंतहा कंजूसी करते हैं

डॉक्टरों का मानना है कि गंभीर से गंभीर मरीज के सही होने में दवाओं की भूमिका सिर्फ 10 फीसदी होती है। मरीज 50 फीसदी अपनी सकारात्मक सोच और 40 फीसदी डॉक्टर की सकारात्मक सोच से सही होता है। कभी अपने आपसे सवाल करिए कि आखिर आपकी सबसे बड़ी कमजोरी क्या है? निःसंदेह 100 में 90 लोग ऐसे पाएंगे कि आत्म अवमूल्यन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। सफल और असफल लोगों के चरित्र की तुलना करिए तो पता चलेगा कि असफल लोग न केवल दूसरों के मूल्यांकन में बल्कि अपने मूल्यांकन में भी बेइंतहा कंजूसी करते हैं। 

पहले अपने आपके मित्र बनो तभी किसी और के मित्र बन सकते हो

असफल लोगों में अपनी कीमत महसूस करने का आत्म गौरव नहीं होता है जबकि सफल लोग अपनी कीमत समझते हैं। अपने प्रति आत्म गौरव का भाव रखते हैं। अपने प्रति यह गौरव भाव उनकी सोच में गहराई और ऊंचाई पैदा करता है। यदि कोई व्यक्ति अपने प्रति सजग है, अपने प्रति संवेदनशील है तो वह दुनिया के प्रति भी एक सकारात्मक नजरिया रखता है। विवेकानंद कहते थे, ‘पहले अपने आपके मित्र बनो तभी किसी और के मित्र बन सकते हो। पहले अपने प्रति हार्दिक होकर सोचो तभी किसी और के प्रति हार्दिक होकर सोच सकते हो।’ शायद इसलिए जैन तीर्थंकर महावीर ने नारा दिया था, ‘जीयो और जीने दो।’

‘सादा जीवन जियो’

गाँधी जी कहते थे, ‘सादा जीवन जियो’ मगर विचार ऊंचे रहें, सादा जीवन का मतलब यह भी नहीं था कि भूखे रहो। सादा जीवन का मतलब यह भी नहीं था कि नंगे रहो। सादा जीवन से उनका आशय था कि ढोंग में न पड़ो, दिखावा न करो। अभाव में जीना कोई सादा जीवन नहीं होता। सकारात्मक सोच सपफलता का पहला पायदान है इसलिए अगर जीवन में सफलता चाहिए तो सकारात्मक सोच रखिए। 

हीनता बोध उनकी पल-पल की गतिविधियों में झलकता है

‘हाऊ टू थिंक बिग?’ इस सवाल का प्रसिद्ध विचारक डेविड जे. स्वार्टज ने अपनी किताब ‘द मैजिक ऑफ थिंकिंग बिग’ में बहुत रोचक जवाब दिया है। डेविड लिखते हैं कि ज्यादातर लोग अपने प्रति उदासीन रहते हैं। उनमें बिना किसी  वजह के हीनताभाव रहता है। यह हीनता बोध उनकी पल-पल की गतिविधियों में झलकता है। मसलन किसी नौकरी का कोई विज्ञापन निकला और यह नौकरी बिलकुल वैसी ही हो जैसी कि उन्हें दरकार है, फिर भी नकारात्मक सोच वाले लोग अपनी ही तरफ से पचासों किंतु-परंतु निकाल लेंगे। ‘मेरे जैसे लाखों लोग हैं जिन्हें नौकरी चाहिए, भला मेरा नंबर कहां आएगा?’ जबकि सकारात्मक सोच वाले लोग खुद से ही इस तरह के नकारात्मक सवाल करके नौकरी का प्रयास नहीं छोड़ देंगे। वे कोशिश करेंगे। कोशिश करने में क्या हर्ज है? 

यह बात हमेशा याद रखिए : 

  • कभी भी यह न कहिए कि पांच वर्ष तो बहुत लंबा समय होता है और मैं तरक्की के लिए इतना इंतजार नहीं कर सकता। हमेशा सोचिए कि मुझे तो 30 साल तक ऊंचे पद पर रहना है। इतनी लंबी अवधि के लिए पांच साल क्या होते हैं?

  • कभी यह न कहिए कि अब कुछ नहीं हो सकता, बल्कि कहिए कि कोशिश करनी चाहिए। 

  • कभी भी यह न कहिए कि मैं ये प्रोडक्ट नहीं बेच सकता। अगर किसी प्रोडक्ट को नहीं भी बेच पाएं तो भी कहिए कि मुझे शीघ्र ही वह फार्मूला मिल जायेगी। जिससे  मैं इस प्रोडक्ट को बेचने में कामयाब हो जाऊंगा।

  • प्रतियोगिता तो तगड़ी है। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन कोई एक सारा फायदा ले जाएगा, ऐसा नहीं हो सकता। निश्चित रूप से हमारी मेहनत रंग लाएगी। #

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