रात्रि भोजन सेहत के लिए क्यों होता है हानिकारक? जानिए कुछ खास वजह...


जीवन के लिए हवा, पानी के बाद भोजन सबसे आवश्यक तत्व है। भोजन से शरीर के विकास तथा संचालन हेतु आवश्यक ऊर्जा मिलती है। अतः यह आवश्यक है कि भोजन करते समय इन उद्देश्योें की पूर्ति का विशेष ख्याल रखा जाए। यदि इन बातों का ध्यान रखा जाए तो जो भोजन स्वस्थ्यवर्धक होना चाहिए, स्वास्थ्य भक्षक बन जाता है। तो चलिए बात करते हैं हम भोजन के समय के बारे में तथा भोजन से होने वाले उन लाभ व हानि के बारे में जिनके बारे में हमारे मन में कई तरह के सवाल उठते रहते हैं। उदाहरण के तैर पर कुछ सवाल इसप्रकर से हैंः

प्रकृति में एक निश्चित नियमानुसार दिन-रात होते हैं

भोजन कैसा हो? उसमें कौन-कौन से पौष्टिक तत्व कितनी-कितनी मात्रा में होने चाहिए? क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए? इन बातों के संबंध में चिकित्सक और आज का पढ़ा-लिखा मानव अवश्य ज्ञान रखता है और जन साधारण के लिए विपुल साहित्य भी उपलब्ध है। फिर भले ही स्वाद के वशीभूत हो उन नियमों का पूर्ण पालन न भी कर सके। जितना जीवन के लिए भोजन आवश्यक है उससे भी अधिक उसका पाचन अवश्यक है। अतः हमें उन सब कारणों से बचना चाहिए जो भोजन का पाचन करने में बाधक है। प्रकृति में एक निश्चित नियमानुसार दिन-रात होते हैं। व्यक्ति की दिनचर्या और रात्रिचर्या का अलग-अलग विधान है। इन तथ्यों की उपेक्षा से अच्छे अच्छा पौष्टिक भोजन भी हानिकारक बन जाता है।

कृत्रिम प्रकाश में उजाला तो है, परन्तु वह सूर्य की बराबरी नहीं कर सकता

सूर्यास्त के पश्चात बहुत से सूक्ष्म जीव पैदा हो जाते हैं। सूर्य का प्रकाश इन कीटाणुओं को पैदा होने से रोकता है। सूर्य के ताप में अनेक विषैले कीटाणु निष्क्रिय बन जाते हैं, जो सूर्यास्त के बाद पुनः सक्रिय होने लगते हैं। प्रायः हम अनुभव करते हैं कि दिन 1000 वाट के बल्ब के पास भी सूक्ष्म जीवन नहीं आते जबकि रात में थोड़ी सी रोशनी में बल्ब के आसपास मच्छर मंडराने लगते है।। ये जीव आहार की गंध के कारण भोज्य पदार्थाें की तरफ आकर्षित होते हैं। वहीं दूसरी तरफ भोजन में भी अनेक सूक्ष्म बैक्टीरिया उत्पन्न हो जाते हैं। इनका रंग भोजन के रंग जैसा ही होने से कृत्रिम प्रकाश में हम इन्हें नहीं देख पाते। कृत्रिम प्रकाश में उजाला तो है, परन्तु वह सूर्य की बराबरी नहीं कर सकता। पूर्ण शाकाहारियों के लिए यह भोजन निश्चित रूप से त्याज्य है। रात्रि में तमस (अंधेरे) के कारण वैसे भी भोजन तामसिक बन जाता है। व्यक्ति स्वार्थी बनने लगता है। ध्यान, आत्म चिंतन व स्वाध्याय  में बाधा उत्पन्न होने लगती है। रात्रि भोजन से स्मरण शक्ति कमजोर होने लगती है। व्यक्ति अपनी क्षमताओं को पूर्णरूपेण विकसित नहीं कर पाता।

जब व्यक्ति देर से भोजन करेगा तो सोएगा भी देर से और देर से उठेगा भी

भोजन और शयन के बीच कम से कम चार घंटे का अंतर आवश्यक है। सोने के समय तक भोजन पूरा पाचन न हो तो भोजन का वह अंश आमाशय में ही पड़ा रहता है और पाचन संबंधी अनेक रोगों को पैदा करने का कारण बनता हे। कहावत है जल्दी सोने तथा जल्दी उठने से व्यक्ति सेहतमंद, सम्पन्न, समृद्धशाली और बुद्धिमान होता है। इस दृष्टि से भी जब व्यक्ति देर से भोजन करेगा तो सोएगा भी देर से और देर से उठेगा भी। ऐसे व्यक्ति अपनी क्षमताओं का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाते। आज मधुमेह (डायबीटीज) जैसे अनेक रोगों को पैदा करने में रात्रि भोजन भी एक मुख्य कारण है, इससे पेट बढ़ने लगता है तथा पाचन संबंधी रोग पैदा हाते हैं जो चिंतन और चिन्ता का विषय लें।

हमारे आमाशय में हम जो डालते हैं वह भी पेट की उष्णता (जठराग्नि) के कारण ही पचता है

सूर्य की रोशनी से शरीर में रोग-प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है। इसी कारण प्रायः अधिकांश रोगों का प्रकोप रात में बढ़ने लगता है। प्रत्येक बीमारी अपेक्षाकृत रात में ज्यादा सताती है। इसका मुख्य कारण रात में सूर्य की गर्मी का अभाव है। जिस प्रकार चूल्हे पर रखी हुई वस्तु को जब अग्नि की गर्मी मिलती है तभी वह पकती है। उसी प्रकार हमारे आमाशय में हम जो डालते हैं वह भी पेट की उष्णता (जठराग्नि) के कारण ही पचता है। इसकी कारण जिसकी जठराग्नि प्रदीप्त  होती है उसकी पाचन शक्ति अच्छी मानी जाती है। 

सुबह का खाना खुद खाओ, दोपहर का दूसरों को खिलाओ और रात्रि का खाना दुश्मन को खिलाओ

भोजन करते समय उन सब नियमों का पालन करने का प्रयास किया जाना चाहिए, जिनसे जब तक भोजन का पूर्ण पाचन न हो तथा पाचन शक्ति मंद न पड़े। भोजन में शक्ति का माप कैलारीज की उष्णता पर आधारित होता है। पेट की अग्नि कमल जैसी है। कमल को भारतीय संस्कृति में निष्कामता, निर्मलता और निर्लिप्तता का प्रतीक कहा गया है। कमल और सूर्य का संबंध लोक विख्यात है। कमल सूर्योदय के साथ खिलते हैं और सूर्यास्त के साथ उनकी सक्रियता में अंतर आ जाता है। विशेष रूप से नाभि व कमल का पाचन में महत्वपूर्ण योगदान है। सूर्यास्त के पश्चात इसके सक्रिय न होने से रात्रि भोजन का पचन बराबर नहीं होता। इसीलिए तो कहा गया है- सुबह का खाना खुद खाओ, दोपहर का दूसरों को खिलाओ और रात्रि का खाना दुश्मन को खिलाओ। तात्पर्य यह है कि रात्रि में आहार का पाचन बराबर नहीं होता।

वायुमंडल में रात्रि की तुलना दिन में ऑक्सीजन की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा रहती है

आज भोजन शास्त्रियों एवं वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोगों से सिद्ध हो चुका है कि सूर्य की रोशनी में सौर ऊर्जा के प्रभाव से भोजन में पौष्टिकता तथा विटामिन की मात्रा बढ़ जाती है क्योंकि उस समय कीटाणुओं की उपस्थिति नगण्य होती है। जो सांयंकाल हाते-होते बढ़ने लगते हैं। सूर्य के प्रकाश में वृक्ष एवं पेड़ पौधे ऑक्सीजन रूपी प्राण वायु छोड़ते हैं। अतः वायुमंडल में रात्रि की तुलना दिन में ऑक्सीजन की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा रहती है। जिससे पाचन सरलता से होता है। इसके विपरीत रात में वृक्ष ऑक्सीजन ग्रहण कर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ते हैं। 

योगशास्त्र में भी रात्रि भोजन और तामसिक भोजन को स्पष्ट किया गया है

अहिंसा धर्म की कसौटी है। इस कारण रात्रि भोजन निाषेध की बात किसी न किसी रूप में विभिन्न ग्रंथों में मिलती है। महाभारत में स्पष्ट उल्लेख है-‘‘मद्य मांसाशनं रात्रि भोजन कन्दभक्षणं। ये कुर्वन्ति वृथा तेषा तीर्थयात्रा जतस्तपः’’ अर्थात रात्रि भोजन में में हिंसा होती है उसके कारण जप, तप और यात्रा आदि सब व्यर्थ हो जाते हैं। उसके नरक द्वार प्रथम रात्रि भोजनम्। चरक संहिता के अनुसार रात्रि-भोजन दूषित और अम्लीभूत होने से शरीर को बहुत क्षति पहंचाता है। ‘गरुड़ पुराण’ में तो सूर्यास्त के बाद अन्न के मांस और जल के रक्त जैसा हो जाने की बात बहुत स्पष्ट शब्दों में वर्णित है। जिसके भाव निम्न है। अस्तंगते, दिवानाये, आपो रूधिरमुच्यते। अन्नं मांससमं प्रोक्तं मार्कण्डेय महार्धिणा। गीता के सत्रहवें अध्ययन के दसवें श्लोक में कहा गया है- यातयामं गतरसं पूति र्प्युषितं च यत्। उच्छिष्टमामि चामेध्यं भेजनं तामसाप्रियम। अर्थात रात में रखा या बनाया हुआ तथा नीरस, दुर्गंध युक्त तथा किसी जीवन जन्तु के द्वारा र्स्पश किया हुआ और अपवित्र आहार तामस मनुष्यों को ही प्रिय होता है। योगशास्त्र में भी रात्रि भोजन और तामसिक भोजन को स्पष्ट किया गया है। 

जैन धर्म में तो रात्रि भोजन का पूर्ण निषेद्य  है। कोई भी जैन साधु-साध्वी एवं श्रावकाचार का पालन करने वाला सदगृहस्थ रात्रि में भोजन नहीं करता। यदि कोई सदगृहस्थ रात्रि में भोजन न करता हो तो सहज कल्पना हो जाती है कि वह व्यक्ति जैन होना चाहिए। इस प्रकार रात्रि भोजन न करना जैनियों की आज भी पहचान बना हुआ है। सामाजिक दृष्टि से आचार्य रत्नेसेन विजनयजी ने जिस ओसवाल समाज का उद्भव किया, उसके लिए रात्रि में भोजन का त्याग आवश्यक मापदंड रखा था।

भोजन अवकाश का समय निर्धारित करते समय स्वास्थ्य के अनुकूल समय की पूर्ण उपेक्षा की गई है

रात्रि-भोजन के लिए एक तरफ जहां हमारी असजगता एवं उससे पड़ने वाले दुष्प्रभावों की जानकारी का अभाव जिम्मेदार है, तो दूसरी तरफ हमारी सामाजिक व सरकारी व्यवस्थाएं भी उतनी ही जिम्मेदार हैं। सामूहिक भोजन का समय निर्धारित करते समय तथा कार्यालयों में भोजन अवकाश का समय निर्धारित करते समय स्वास्थ्य के अनुकूल समय पर भोजन करने के समय की पूर्ण उपेक्षा की गई है। जैसी व्यवस्था होगी, उसी के अनुरूप जनसाध्याारण अपने आपको ढालता है। जब बच्चे प्रातःकाल जल्दी पाठशाला उएंगे और दोपहर बाद घर पहंचेंगे तो पारिवारिक सदस्य समय पर कैसे भोजन कर सकते हैं? दो भोजन के बीच कम से कम 8 से 9 घंटों का अंतर होना चाहिए। अतः सुबह खाना देर से खाएंगे तो रात का खाना स्वतः देरी से होगा क्योंकि बिना भूख के खाना भी तो उचित नहीं।

सूक्ष्म जीवों की उत्पति के संबंध में हमारी मिथ्या धारणाएं है

दूसरी तरफ आज नाश्ते का प्रचलन बढ़ गया है जो हमारी भूख को समाप्त कर देता है। अतः जिन लोगों को समय पर खाने की अनुकूलता है वे भी समय पर नहीं खाते। तीसरी बात व्यक्ति का भोजन के बारे में जितना संयम रहना चाहिए, उतना नहीं है। इसलिए जब चाहा, जैसा चाहा पेट में डाल देता है, जिससे सौर मंडल की दृष्टि से पाचन के लिए जो सर्वश्रेष्ठ समय है उस समय उनको भूख नही नहीं लगती। चौथी बात रात्रि के प्रकाश के बारे में सूक्ष्म जीवों की उत्पति के संबंध में हमारी मिथ्या धारणाएं है। जिसके फलस्वरूप रात्रि भोजन को आधुनिकता का प्रतीक समझने की भूल हो रही है।

सेहतमंद रखने को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी

जवीन में प्रथम सुख निरोगी काया है। उसके अभाव में सारे सुख अधूरे हैं, अपर्याप्त हैं। इसका कारण कि परिस्थितियां, समस्याएं, प्रतिकूलताएं चाहें जो हों व्यक्ति को अपने आपको सेहतमंद रखने को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी तथा उसके लिए पूर्णरूपेण सजग और सर्तक रहना होगा। रात्रि भोजन के दुष्प्रभावों को समझने के कारण आज अमेरिका में 80 प्रतिशत से भी अधकि रात्रि-भोजन को पंसद नहीं करते हैं।

रात्रि-भोजन आरोग्य के साथ वैज्ञानिक व अध्यात्मिक दृष्टिकोण से अनुपयोगी है

हमें अपनी जीवनचर्या में स्वस्थ्य के प्रतिकूल संस्कारों को बदलना होगा। प्रकृति के नियम व्यक्तिगत अनुकूलताओं के आधार पर नहीं बदलते। आपकी जीवन पद्धति के अनुरूप सूर्योदय और सूर्यास्त का समय निश्चित नहीं होता। बुद्धिमान वही है जो प्रकृति के अनुरूप अपने आपको ढाल लेता है। रात्रि-भोजन आरोग्य के साथ वैज्ञानिक, अध्यात्मिक, सामाजिक एवं पारिवारिक दृष्टिकोण से अनुपयोगी है, हानिकारक है, प्रकृति के विरूद्ध है। अतः स्वास्थ्य प्रेमियों के लिए त्याज्य है तथा उन्हें यथासंभव दिन में ही भोजन करने का प्रयास करना चाहिए। #

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