मानव मस्तिष्क हमेशा से एक अबूझ पहेली रहा है, लेकिन अब उठ सकता है उससे पर्दा


किसी के दिमाग में क्या चल रहा है, इसे भला कौन जान सकता है बस अनुमान ही तो लगाया जा सकता है। इस तरह के बेबसी दर्शाने वाले जुमलों के लिए शायद अगले कुछ दशकों में कोई जगह न बचे क्योंकि जो दावे किये गए हैं उनका अंतिम निष्कर्ष यही है कि अगले 10 से 20 सालों में वैज्ञानिक पूरी क्षमता वाला मनुष्य का कृत्रिम मस्तिष्क प्रयोगशाला में विकसित कर लेंगे। 

स्टेम सेल का इस्तेमाल करके प्रयोगशाला में इंसानी दिमाग का छोटा रूप तैयार करने का दावा किया है

अब जब हू ब हू इंसानी गतिविधियों को अंजाम देने वाला मस्तिष्क विकसित हो जायेगा तो इसका मतलब यह स्वतः है कि वैज्ञानिक मस्तिष्क की समूची क्रियाविधि और विचार बनने की प्रक्रिया को भी समझ लेंगे। हो सकता है इसके बाद अदालतों में सवाल-जवाब के जरिये सच तक पहुंचने की बजाय माने जा रहे गुनहगार को अदालत के कटघरे में खड़ा किया जाये और फिर उनके सिर में तमाम तारों और प्लकों वाला कोई हेलमेट रख बस 20 मिनट इंतजार किया जाये। 20 मिनट बाद सिर से हेलमेट निकालते के साथ ही ब्योरेवार ढंग से सचाई सामने हो। जी हां, यह हॉलीवुड की किसी आगामी या पूर्व साइंस फिक्शन का कोई काल्पनिक दृश्य नहीं है बल्कि मीडिया के सामने वरिष्ठ वैज्ञानिकों द्वारा पूरी गंभीरता से दिमाग को लेकर व्यक्त किया गया अनुमान है। आस्ट्रियन अकेडमी ऑफ साइंसेज में इंस्टिट्यूट ऑफ मोलिक्यूलर बायोटेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने स्टेम सेल का इस्तेमाल करके प्रयोगशाला में इंसानी दिमाग का छोटा रूप तैयार करने का दावा किया है। 

इस बार उन्होंने चार मिमी आकार का दिमाग बनाने में सफलता हासिल की है

इन वैज्ञानिकों ने टेस्ट टयूब में नौ सप्ताह के भ्रूण में दिमाग का जो स्तर होता है, उस स्तर के दिमाग को तैयार करने में सफलता हासिल की है। प्रयोगशाला में तैयार दिमाग इंसानी दिमाग से बस इस मायने में अलग है कि इसमें सोचने समझने की शक्ति नहीं है। लेकिन यह सफलता का पहला चरण है इसलिए यह मानकर चला जा रहा है कि आने वाले सालों में जो दिमाग तैयार होगा उसमें ये शक्ति भी होगी। हालांकि प्रयोगशाला में पहले भी वैज्ञानिक दिमागी कोशिकाएं बनाने में सफल रहे हैं लेकिन इस बार उन्होंने चार मिमी आकार का दिमाग बनाने में सफलता हासिल की है जो अब तक प्रयोगशाला में बना सबसे बड़ा दिमाग है। साथ ही कहा जा सकता है कि यह कृत्रिम दिमाग के विकास में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

वैज्ञानिक फिलहाल कह रहे हैं कि यह इंसानी दिमाग से काफी हद तक मिलता-जुलता है 

टेस्ट टयूब में इस दिमाग को बनाने के लिए भू्रण की मूल कोशिका या वयस्क चर्म कोशिका का उपयोग किया गया। इसे दो महीने तक बायो रिएक्टर में पोषक तत्वों और ऑक्सीजन की मौजूदगी में विकसित किया गया। वैज्ञानिकों ने देखा कि कोशिकाएं स्वयं ही विकसित होकर दिमाग के विभिन्न हिस्सों के रूप में खुद को संगठित करने में सफल रही हैं, जैसे सेरेबरल कोर्टेक्स, रेटिना और हिपोकैम्पस जो बाद में इंसानों में स्मृति के विकास में महत्वपूर्ण होता है। वैज्ञानिक फिलहाल कह रहे हैं कि यह इंसानी दिमाग से काफी हद तक मिलता-जुलता है। हालांकि यह भी कहना सही होगा कि अभी हम वास्तविक दिमाग बनाने से काफी दूर हैं। शोधकर्ताओं में से एक डॉक्टर जुरजेन नोबिलिच ने कहा भी है, ‘प्रयोगशाला में बना दिमाग, दिमाग के प्रतिरूप के विकास के लिए और दिमाग में होने वाली बीमारियों के अध्ययन के लिए अच्छा है।’ नोबिलिच के मुताबिक अंततः हम अधिक आम बीमारियों जैसे सिजोफ्रेनिया या ऑटिज्म की ओर बढ़ना चाहेंगे। 

आखिर दिमाग के विकास का मुख्य अवयव क्या है

हालांकि ये बीमारियां वयस्कों में ही दिखती हैं लेकिन यह पाया गया है कि इनसे संबंधित विकृतियां दिमाग के विकास के समय ही पैदा हो जाती हैं। वैज्ञानिक प्रयोगशाला में बने इस दिमाग को और अधिक विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने एक साल तक इस दिमाग को टेस्ट टयूब में रखा लेकिन यह चार मिमी से ज्यादा नहीं बढ़ा। मतलब यह कि अभी वैज्ञानिकों को सही सही यह नहीं पता चला कि आखिर दिमाग के विकास का मुख्य अवयव क्या है। वैसे दिमाग को समझने, उसका प्रतिरूपण करने और थोड़ी निष्ठुर भाषा में कहें तो उस पर कब्जा जमाने की  फिराक में वैज्ञानिक हमेशा से रहे हैं। 

जब मामूली सी छेड़छाड़ की गयी तो उन्हें गहरी उत्तेजना एवं आनन्द की अनुभूति हुई

करीब एक दशक पहले ब्रिटेन की मशहूर पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट’ में एक सनसनीखेज खुलासा किया था। यह खुलासा था ब्रिटेन तथा अमरीका के कुछ न्यूरो साइंटिस्टों या तंत्रिका वैज्ञानिक, द्वारा चुपके-चुपके मानव मस्तिष्क पर प्रयोग करना। ऐसे प्रयोग करने वाले एक वैज्ञानिक के हवाले से कहा गया था कि कुछ महिलाओं के मस्तिष्क में जब मामूली सी छेड़छाड़ की गयी तो उन्हें गहरी उत्तेजना एवं आनन्द की अनुभूति हुई। सुनने में यह भले मामूली सी बात लगे।  लेकिन वास्तव में यह मामूली थी नहीं। इस मामूली सी दिखने वाली घटना के दो बड़े आयाम हैं एक तो वही इंसानी जिज्ञासा। दुनिया में जो चीज इंसान के लिए जितनी ज्यादा चुनौती पेश करती है, इंसान उसके लिए उतना ही ललक रखने लगता है। दिमाग कुदरत की सबसे जटिल और रहस्यमयी रचना है। इसलिए इंसान सबसे ज्यादा दिमाग को जानने के लिए ही रोमांचित रहता है फिर वो चाहे वैज्ञानिक ही क्यों न हों।

मानवीय गुलामी का एक ऐसा दौर शुरू हो सकता है 

लेकिन इसका एक आपराधिक पहलू भी है। मस्तिष्क से छेड़छाड़ का मतलब है, ‘दिमाग को मुट्ठी में कैद करने की कोशिश।’ यह खौफनाक है क्योंकि वैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों के समूह को आशंका है कि अगर सचमुच फेरबदल की ताकत इंसान ने हासिल कर ली या कृत्रिम दिमाग वास्तविकता बन गया तो मानवीय गुलामी का एक ऐसा दौर शुरू हो सकता है जिसकी अभी तक कल्पना भी नहीं की गई हो। निःसंदेह इसके कुछ फायदे भी हो सकते हैं जैसे कि हर खतरनाक खोज से कुछ फायदे होते हैं। मगर सच्चाई यह भी है कि ऐसी तमाम खोजें इन्हीं फायदों के लिए शुरू नहीं की जाती हैं यानी इनका मकसद कुछ और होता है। यहां भी आशंका यही है कि एक बार मस्तिष्क नियंत्रण की कुंजी का पता चल गया तो फिर यह कहना बहुत मुश्किल होगा कि उसका कौन कैसा उपयोग करेगा।

मस्तिष्क की कुछ ऐसी अबूझ पहेलियां हैं जहां तक वैज्ञानिक या तो पहुंच नहीं पाए 

मानव शरीर पर हुए अनुसंधानों में आज तक सबसे अधिक अनुसंधान मस्तिष्क पर ही हुए हैं फिर भी सच्चाई यही है कि हम अब भी मस्तिष्क के बारे में बहुत ज्यादा कुछ नहीं जानते। भाषाओं को सीखने और समझने का मैकेनिज्म, प्रेम और नफरत की रहस्यात्मकता और सच तथा झूठ के द्वंद की गहनता आज भी मस्तिष्क की कुछ ऐसी अबूझ पहेलियां हैं जहां तक वैज्ञानिक या तो पहुंच नहीं पाए यदि पहुंच भी गए हैं तो उनके दावे विश्वास नहीं पैदा करते। क्योंकि उनके दावों में ज्यामितीय समरूपता नहीं है। वैज्ञानिकों के लिए अभी भी चेतना, भावना, स्मरण एवं  तर्क शक्ति ज्ञान का भंडार, स्वप्नों की अनोखी दुनिया यहां तक कि मनुष्य की वास्तविक मौत जैसी बातें भी अबूझ पहेलियों की तरह ही हैं।

मस्तिष्क को लेकर पूरी दुनिया में वैज्ञानिकों का रुझान बढ़ा है

इन तमाम अबूझ पहेलियों की खान है हमारा मस्तिष्क। यही वजह है कि चिकित्सा विज्ञान में मस्तिष्क को लेकर हमेशा आकर्षण रहा है। 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में मस्तिष्क को लेकर पूरी दुनिया में वैज्ञानिकों का रुझान बढ़ा जो कि 21वीं शताब्दी के इस दूसरे दशक में भी जारी है। यही वजह है कि आज मस्तिष्क संबंधी न केवल तमाम अनुसंधान चर्चा में हैं बल्कि तंत्रिका विज्ञान मस्तिष्क में हस्तक्षेप कर सकने की स्थिति में पहुंच गया लगता है। डॉ. स्नाइडर ने मानव भ्रूण के मस्तिष्क में कुछ ऐसी खास कोशिकाएं ढूंढ़ निकाली हैं जो आने वाले समय में दिमाग की एक प्रकार की कोशिका नहीं बल्कि कई तरह की कोशिकाओं को जन्म देंगी। इन अलादीनी चिराग माफिक न्यूरल स्टेम सेल को तंत्रीय कोशिका नाम दिया गया है जो वास्तव में एक तरह से मूल कोशिका है। अपने गहन परीक्षण के दौरान डॉ. स्नाइडर ने इस मूल कोशिका को प्रयोगशाला में मस्तिष्क जैसी परिस्थितियों में कई बार विकसित कर पाने में सफलता हासिल की है।

इंसान के दिमाग में मृत कोशिकाओं का स्थान लेने के लिए इंजेक्शन द्वारा प्रतिरोपित कर सकेंगे

हालांकि बीच में इसकी प्रगति रिपोर्ट से दुनिया अनजान रही लेकिन अब यह बात सामने आ रही है कि जो अनुमान कुछ साल पहले लगाए गए थे वो अनुमान अब जल्द ही सफल होंगे यानी वैज्ञानिक ऐसी मस्तिष्क कोशिकाओं को विकसित कर पाने के बिल्कुल नजदीक पहुंच गए हैं जिन्हें वे इंसान के दिमाग में मृत कोशिकाओं का स्थान लेने के लिए इंजेक्शन द्वारा प्रतिरोपित कर सकेंगे। निःसंदेह डॉ. स्नाइडर और उनके सहायकों ने इस महत्वपूर्ण खोज के संबंध में तमाम मानवीय उपयोग गिनाए हैं। जो सचमुच इंसान के जीवन को बहुत खूबसूरत बना सकते हैं। लेकिन जिस तरह हर महान तकनीक, विचार और वस्तु की आनन-फानन में अनुकृति तैयार हो जाती है उसी तरह हर महान खोज के उपयोगी लक्ष्यों के साथ ही उसके खतरनाक प्रयोग भी चिन्हित हो जाते हैं। जब ये मूल कोशिकाएं बड़े पैमाने पर विकसित हो जाएंगी तो इन्हें इंजेक्शन द्वारा मस्तिष्क में रोपकर क्षतिग्रस्त मस्तिष्क को सही किया जा सकेगा।

छेड़छाड़ का खतरा

एक बार अगर इंसान मस्तिष्क में छेड़छाड़ करने में माहिर हो गया तो फिर इंसानियत पर इस बात का खतरा मंडराने लगेगा कि वैज्ञानिक लोगों के दिमाग को अपनी इच्छानुसार डिजाइन करने लगेंगे। हालांकि स्वस्थ कृत्रिम दिमाग के बहुत फायदे गिनाये जा सकते हैं। जैसे इससे भुलक्कड़पन रोका जा सकेगा बिगड़े मानसिक संतुलन को नियंत्रित किया जा सकेगा। संभव है इन्हीं के दम पर कोई नया रहस्य भी उघड़े या फिर प्रयोगशाला में तैयार कोशिकाओं का इस्तेमाल किसी को जीनियस बनाने के लिए भी हो। 

किसी के मस्तिष्क में जीनियस या फिर भोंदू और दुष्ट वाले गुणसूत्र डाले जा सकते हैं

लेकिन इसका उपयोग इसके उलट भी हो सकता है यानी यदि किसी के मस्तिष्क में जीनियस बनाने वाले गुणसूत्र डाले जा सकते हैं तो उसमें भोंदू और दुष्ट बनाने वाले तत्व भी विकसित किए जा सकते हैं जैसा कि तमाम हॉलीवुड फिल्मों में होते दिखाया जाता है। वैसे भी वैज्ञानिकों की सदियों से एक फैंटेसी रही है कि वह दुनिया के सबसे बड़े हथियार के रूप में कोई ऐसा इंजेक्शन विकसित कर लें, जिससे मनमाफिक परिणाम लिये जा सकें।समाजशास्त्रियों को आशंका है कि एक बार दिमाग से छेड़छाड़ की कोशिश में अगर वैज्ञानिक मेधा सफल हो गयी तो इसका उपयोग आतंकवादी भी कर सकते हैं। 

खतरनाक से खतरनाक उपयोग क्या हो सकता है

जाहिर है वह इसके उलट फायदों को हासिल और दहशत पैदा करने के लिए ही करेंगे। वैसे ये मजाक नहीं सच है क्योंकि जब से वैज्ञानिकों ने दिमाग की संरचनात्मक गुत्थी को सुलझाने में सफलता हासिल की है तब से आतंकवादी कई मस्तिष्क वैज्ञानिकों को अगवा कर चुके हैं और उनसे यह राज जानने की कोशिश भी कर चुके हैं कि उनका खतरनाक से खतरनाक उपयोग क्या हो सकता है। हालांकि अभी आतंकवादी ऐसा कुछ नहीं कर पाये जो वह करना चाहते हैं। लेकिन भविष्य में भी यही स्थिति बनी रहेगी, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

तुम चलो, मैं दिमाग में बैलेंस डलवा के आता हूं

आज भले ये मजाक लग रहा हो लेकिन मशहूर सूचना  प्रोद्योगिकी विशेषज्ञ रेकुरुजविल के मुताबिक  भविष्य में  दिमाग की स्मार्टनेस का बैलेंस डलवाया जा सकेगा। उनके मुताबिक 2029 में मशीनें इंसानों की तरह ही स्मार्ट हो जाएगी। अतः चिप को तंत्रिका तंत्र से जोड़कर हम मानव को और स्मार्ट बना सकेंगे। यह कुछ कुछ वैसा ही होगा जिस तरह से आज हम वर्चुअल रिएलटी गेम का इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद इंसान की सोच का दायरा भी काफी बड़ा हो जाएगा। कुरुजविल के मुताबिक, ‘सूचना प्रौद्योगिकी जिस तरह से बढ़ रही है, दशक पहले जितना कंप्यूटर इस्तेमाल में आता था, उसकी तुलना में आज हम दोगुनी तेजी से कंप्यूटर की ताकत का इस्तेमाल करते हैं, भविष्य में इसकी ताकत का और इस्तेमाल लगातार होगा। लोग अपनी क्षमताओं को बचाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल करने लगेंगे जिसमें स्मार्टनेस का बैलेंस जैसी चीजें भी होंगी।’

वैसे यह सिर्फ फैशन या गणितीय जोड़ घटाव बढ़ाने का जरिया भर नहीं होगा। बल्कि चिप को मस्तिष्क में लगाने के बाद कई रोगों का निदान किया जा सकता है, जैसे पार्किंन्सन से पीड़ित रोगियों के अलावा बधिर लोगों को भी सक्षम बनाया जा सकता है तो क्या आपका क्या ख्याल है मैं तो जा रहा हूं। #

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