क्या होता है एड्स? जानिए कैसे होता है इसका उपचार...


एड्स एक ऐसी महामारी है जिसके लिए रोगी उत्तरदायी होता है। मानसिक संतुलन के बिगड़ने पर ही मनुष्य अस्वाभाविक व्यवहार करता है। अस्वााभाविक यौन व्यवहार ही इस महामारी की जड़ है। एड्स से संक्रमित व्यक्ति में यह धीरे-धीरे आगे चलकर एक भयंकर रूप धारण कर लेता है। हर एक प्राणी के प्रजनन अंग होते हैं और उन अंगो का विशेष कार्य होता है। मनुष्य को छोड़कर अन्य प्राणी इन गुप्तांगों के साथ छेड़छाड़ नहीं करतें है। पशु-पक्षियों तथा अन्य जीव जन्तुओं में संभोग क्रिया एक प्राकृतिक नियम है। प्रजनन के कार्य के लिए प्रकृति ने एक विशेष समय व परिस्थिति निर्धारित कर रखा है। जिसके हिसाब से समस्त जंतु जगत के जन्म व मृत्यु का जीवन चक्र चलता रहता है। 

एड्स की रोकथाम के प्रयास

आज विश्व में करोड़ों रूपये एड्स महामारी पर शोध कार्य करने और इसके सफल इलाज की खोज के लिए खर्च किए जा रहें हैं लेकिन दुर्भाग्यवश अभी तक इस दिशा में कोई ठोस सफलता हासिल नहीं हो पाई है। हालांकि, एड्स की रोकथाम के लिए हुए अनेक प्रयासों के परिणामस्वरुप एक टीके की खोज हुई है। लेकिन उस टीके का परीक्षण भी अमरीका में किया जा चुका है। पर अभी भी वह टीका प्रचलित नहीं हो पाया है।

क्या अप्राकृतिक क्रियाएं ही एड्स के लिए जिम्मेदार हैं 

तमाम सामाजिक मनावैज्ञानिक और शरीरिक विकृतियों के कारण जब प्रकृति के नियमों का उल्लंघन कर समलिंगीय मैथुन जैसी के अप्राकृतिक क्रियाएं करता है। तब उसके प्रजनन अंग कुछ ऐसे दबाव और ऐसी प्रक्रियाओ से गुजरते है जिनके लिए प्रकृति ने उन्हें बनाया नही है। यह अस्वाभाविक क्रिया और दबाव ही एड्स जैसी महामरी का मूल है। 

क्या  एड्स एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलने वाल रोग है

प्रजनन अंग पर हुए अनजाने में प्रहार से इनका कुछ हिस्सा मृत-प्रायः जैसा हो जाता है। उन जगहों पर जीवाणु और बाद में शुक्राणु उत्पन होकर उस मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इससे वह व्यक्ति इस रोग से ग्रसित हो जाता है। इसके बाद वह व्यक्ति जितने भी लोगो के साथ शारीरिक संपर्क में आता है तो वह अपने शुक्राणु उस पर छोेड़ देता है। जिसका पता तुंरत नहीं लगता है। इसी तरह यह रोग एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे व्यक्ति के शरीर में प्रवेश पाता है। 

क्या  रक्त प्रत्यारोपण से भी एड्स हो सकता है

अस्पतालों में असावधानी बरतने के कारण भी वहां पर चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाले संयंत्रों के माध्यम से एड्स के जीवाणु या शुक्राणु किसी व्यक्ति के शरीर तक पहुंच जाते हैं जो कि उसके एड्स के कारण बनता हैं। उदाहरण के तौर पर देखें तो जैसे सूई को निर्धारित तापमान पर न उबालने से रक्त प्रत्यारोपण से भी एड्स हो सकता है। अभी तक हमारे पास एड्स की शुरूआती स्टेज पर पहचानने व उसका इलाज करने के प्रभावी उपाय हमारे पास उपलब्ध नहीं है। 

एड्स की बीमारी वंश तक समाप्त कर देती है

जहां-जहां पर भी नशे के नये-नायाब तरीके अपनाये गए हैं वहां भी एड्स जैसी महामारी पनपती है। इसे हम छूत की महामारी भी कह सकते है। एड्स जिस परिवार में हो जाता है उस परिवार की आने वाली नन्ही जाने भी उससे नहीं बच पाती है। इस तरह बच्चा से एड्स की बीमारी के साथ ही पैदा होता है और वह बच्चा धीरे-धीरे मौत के काफी करीब पहुंच जाता है। जिन परिवारों में एड्स की बीमारी दस्तक देती है उस परिवार का वंश भी समाप्त हो जाता है।

रक्त वायरस के सक्रिय अंश का बिलगावन 

मास्को के रोगक्षम विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने एड्स वाइरस प्रोटीन के सर्वाधिक सक्रिय अंश को बिलगाने में सफलता प्राप्त की है। इससे एड्स की रोकथाम के लिए वैक्सीन को विकसित करने में बहुत प्रगति हुई है। इन वैज्ञानिकों ने इन प्रोटीन अंशों पेप्टाइडो को संश्लेषित करने में भी सफलता प्राप्त की है। इन पेप्टाइडो का उपयोग करके वैक्सीन का निर्माण संभव हो सकेगा। संस्थान में किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया है कि एड्स के वाइरस इन प्रोटीन अंशों के साथ उसी प्रकार क्रिया करते हैं जैसे वे निष्क्रिय वायरसों से करते हैं। अमेरिका के एक फर्म ने भी एक ऐसी दवा की खोज की है जो एड्स की वाइरस कोशिकाओं के प्रजनन को रोकनें में सक्षम है। इस औषधि काि नाम है‘‘ रिवबिरिन’’’। अध्ययनों में ‘‘रिवबिरिन’’ को एड्स के वायरसों की वेश वृद्धि को रोकने में सफल पाया गया है।

क्या प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन ही एड्स के लिए जिम्मेदार हैं 

विश्व के उन देशों में एड्स अधिक फैला हुआ है जहां पर पश्चिमी सभ्यता का असर है। पाश्चात्य जीवन शैली में आत्म नियंत्रण और संयम का अभाव है। पूरी तरह से भोगवाद पर ही जोर देता है। मादक पदार्थाें के सेवन में प्राकृतिक नियमों के उल्लंघन करने तथा प्रकृति से दूर रहने के कारण पाश्चात्य जगत सबसे पहले एड्स का शिकार हुआ। वास्तव में एड्स पाश्चात्य सभ्यता की जीवन शैली का ही एक अभिशाप है। #

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